छठे भाव का परिचय– छठा भाव एक अशुभ स्थान माना जाता है| तीन सर्वाधिक अशुभ स्थानों, अर्थात षष्ठ, अष्टम व द्वादश स्थान में षष्ठ भाव द्वितीय स्तर पर आता है| अष्टम स्थान सर्वाधिक अशुभ है, इसके पश्चात षष्ठ तथा अंत में द्वादश स्थान अशुभ होता है| इसलिए छठे भाव को दुष्ट स्थान अर्थात अशुभ स्थान […]
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पूर्णिमा व्रत परिचय- प्रत्येक मास के शुक्लपक्ष की पूर्णिमा तिथि को पूर्णिमा का व्रत करने का शास्त्रादेश है| हिन्दू पंचांग के अनुसार पूर्णिमा शुक्लपक्ष की अंतिम 15वीं तिथि होती है| इस दिन चंद्रमा आकाश में पूर्ण रूप से दिखाई देता है| इस दिन का हिन्दू धर्म में अत्यंत महत्व हैं। इस तिथि पर चन्द्रमा पक्षबली […]
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विवाह मानव जीवन के लिए अपरिहार्य संस्कार है। विवाह ही एक युवक व युवती को दंपति के रूप में साथ रहने की की वैधता व सामाजिक मान्यता प्रदान करता है। विवाह के पश्चात अनजाने परिवारों(कुलों) के दो सदस्य दाम्पत्य जीवनरूपी नौका में सवार होते हैं। जीवन भर दोनों को एक-दूसरे के पूरक के रूप में […]
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गणेश शब्द की परिभाषा व गणेश जी का परिचय- गणेश शब्द ग, ण तथा ईश शब्द से मिलकर बना है| ग शब्द ज्ञानार्थ वाचक है| ज्ञान से बुद्धि की वृद्धि होती है| ण शब्द निर्वाण वाचक है| अंतिम शब्द ईश स्वामी वाचक है| इस प्रकार संपूर्ण गणेश शब्द का अर्थ हुआ- ज्ञान-बुद्धि तथा निर्वाण के […]
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भारतीय संस्कृति में गणेश जी को विद्या-बुद्धि का प्रदाता, विघ्न-विनाशक, मंगलकारी, रक्षाकारक, सिद्धिदायक, समृद्धि, शक्ति और सम्मान प्रदायक माना गया है| गणेश जी अपने भक्तों की समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करते हैं और उन्हें कष्टों से मुक्त करके सभी प्रकार का वैभव प्रदान करते हैं| इस बारे में शास्त्रों में भी कहा गया है कि […]
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गणेश जी की पूजा के बिना कोई भी लौकिक अथवा शुभ कार्य का प्रारंभ नही होता है| अपने जीवन में जब हम किसी भी कार्य को प्रारंभ करते हैं तब भगवान श्री गणेश जी का ध्यान अवश्य करते हैं| हिन्दू धर्म को मानने वाले सभी व्यक्ति इस सत्य को स्वीकार करते हैं कि श्री गणेश […]
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पंचम भाव का परिचय- पंचम भाव एक त्रिकोण भाव है| कुंडली के तीन त्रिकोण स्थान, अर्थात प्रथम, पंचम व नवम स्थान में से पंचम स्थान बहुत ही महत्वपूर्ण है| यह भाव संचित पूर्व-पुण्य, अर्थात पूर्व जन्म के कर्मों के संग्रह को दर्शाता है| इसलिए इसका एक नाम पूर्व पुण्य भाव भी है| व्यक्ति के पूर्वजन्म […]
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चतुर्थ भाव का परिचय– चतुर्थ भाव सुख स्थान या मातृ स्थान के नाम से जाना जाता है| इस भाव में व्यक्ति को प्राप्त हो सकने वाले समस्त सुख विद्यमान है इसलिए इसे सुख स्थान कहते हैं| मनुष्य का प्रथम सुख माता के आँचल में होता है| केवल वही है जो व्यक्ति की तब तक रक्षा […]
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तृतीय भाव का परिचय– तृतीय भाव प्रथम उपचय स्थान है| यह अपोक्लिम भावों की श्रेणी में भी आता है| उपचय स्थान का अर्थ है वृद्धि या बढोतरी का स्थान| इस भाव से जातक के अनुज सहोदरों के संबंध में ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है| यदि 12 भावों को धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष इन […]
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प्रदोष व्रत का परिचय– प्रदोष व्रत एक सर्वकार्य सिद्धि व पापनाशक व्रत है| प्रत्येक पक्ष की त्रयोदशी तिथि को यह व्रत किया जाता है| प्रदोष का सामान्य अर्थ रात का शुभारंभ माना जाता है अर्थात जब सूर्यास्त हो चुकने के बाद संध्याकाल आता है, तो रात्रि के प्रारंभ होने के पूर्व काल को प्रदोषकाल कहते […]
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