चतुर्थ भाव का परिचय– चतुर्थ भाव सुख स्थान या मातृ स्थान के नाम से जाना जाता है| इस भाव में व्यक्ति को प्राप्त हो सकने वाले समस्त सुख विद्यमान है इसलिए इसे सुख स्थान कहते हैं| मनुष्य का प्रथम सुख माता के आँचल में होता है| केवल वही है जो व्यक्ति की तब तक रक्षा […]
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तृतीय भाव का परिचय– तृतीय भाव प्रथम उपचय स्थान है| यह अपोक्लिम भावों की श्रेणी में भी आता है| उपचय स्थान का अर्थ है वृद्धि या बढोतरी का स्थान| इस भाव से जातक के अनुज सहोदरों के संबंध में ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है| यदि 12 भावों को धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष इन […]
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प्रदोष व्रत का परिचय– प्रदोष व्रत एक सर्वकार्य सिद्धि व पापनाशक व्रत है| प्रत्येक पक्ष की त्रयोदशी तिथि को यह व्रत किया जाता है| प्रदोष का सामान्य अर्थ रात का शुभारंभ माना जाता है अर्थात जब सूर्यास्त हो चुकने के बाद संध्याकाल आता है, तो रात्रि के प्रारंभ होने के पूर्व काल को प्रदोषकाल कहते […]
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द्वितीय भाव का परिचय- कुडंली का द्वितीय भाव किसी भी व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण है| इसे धन भाव भी कहा जाता है| इस भाव से धन-धान्य, संपति, कुटम्ब, वाणी, नेत्र, भोजन मुख, विद्या, संचित धन, स्वर्ण, रजत आदि मूल्यवान वस्तुएं, वाक्पटुता, गायन कला तथा सत्य-असत्य भाषण आदि का विचार किया जाता है| द्वितीय भाव के […]
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प्रथम भाव जन्मकुंडली का सबसे महत्वपूर्ण भाव है| इसे लग्न भी कहा जाता है| लग्न का अर्थ है-लगा हुआ युक्त अथवा संलग्न| किसी भी व्यक्ति के जन्म के समय पूर्वी क्षितिज पर जो राशि विद्यमान होती है, वही उस व्यक्ति की लग्न बन जाती है| लग्न क्यों महत्वपूर्ण है? इसलिए क्योंकि इसी राशि विशेष के […]
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शनि परिचय- पौराणिक कथाओं के अनुसार शनिदेव का जन्म सूर्य की पत्नी छाया के गर्भ से हुआ है। कहते हैं कि इनके जन्म के समय जब इनकी दृष्टि अपने पिता सूर्य पर पड़ी तो उन्हें कुष्ठ रोग हो गया तथा उनके सारथी अरुण पंगु हो गए थे। शनि के भाई का नाम यम तथा बहन […]
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मनुष्य को ईश्वर से जोड़ने की अनेक विधाएं हैं, इन्ही में यंत्र विधा भी एक है। ईश्वर की कृपा प्राप्ति के जिन अनेक मार्गों के बारे में हमारे पवित्र ग्रंथों में बताया गया है, उनमें यंत्र प्रयोग भी एक विशेष मार्ग है। हिन्दू धर्म पूरे संसार भर में सर्वाधिक व्यापक और सर्वोच्च धार्मिक प्रवृति का […]
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‘अक्षय’ शब्द का अर्थ है- जिसका कभी क्षय अथवा नाश न हो। इस पर्व पर किया हुआ जप, तप, तथा दान अक्षय फल देने वाला होता है इसलिए इसे ‘अक्षय तृतीया’ कहते हैं। सोमवार तथा रोहिणी नक्षत्र से युक्त तृतीया हो तो उसमें स्नान और उपवास करने से अखंड फल की प्राप्ति होती है। एक […]
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अक्षय तृतीया की परिभाषा- वैशाख शुक्ल तृतीया को अक्षय तृतीया कहते हैं। यह सनातनधर्मियों का प्रधान त्यौहार है। इस दिन किया हुआ जप, तप, यज्ञ व दान अक्षय फलदायक होता है इसलिए इस पर्व को अक्षय तृतीया या आखा तीज के नाम से जाना जाता है। इस वर्ष अक्षय तृतीया 2017 में 28 अप्रैल को […]
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नवरात्रि का महत्व- नवरात्रि शब्द संस्कृत भाषा के दो शब्दों ‘नव’ व ‘रात्रि’ से मिलकर बना है। भारतीय संस्कृति के अनुसार “दुर्गा” शब्द का अर्थ जीवन से दुखों को मिटाने वाली यानि दुर्गति का शमन करने वाली देवी से है। नवरात्रि, मां दुर्गा को समर्पित एक महत्वपूर्ण पर्व है। इसे समस्त भारतवर्ष में अत्यधिक उत्साह […]
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