पंचम भाव का परिचय- पंचम भाव एक त्रिकोण भाव है| कुंडली के तीन त्रिकोण स्थान, अर्थात प्रथम, पंचम व नवम स्थान में से पंचम स्थान बहुत ही महत्वपूर्ण है| यह भाव संचित पूर्व-पुण्य, अर्थात पूर्व जन्म के कर्मों के संग्रह को दर्शाता है| इसलिए इसका एक नाम पूर्व पुण्य भाव भी है| व्यक्ति के पूर्वजन्म […]
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चतुर्थ भाव का परिचय– चतुर्थ भाव सुख स्थान या मातृ स्थान के नाम से जाना जाता है| इस भाव में व्यक्ति को प्राप्त हो सकने वाले समस्त सुख विद्यमान है इसलिए इसे सुख स्थान कहते हैं| मनुष्य का प्रथम सुख माता के आँचल में होता है| केवल वही है जो व्यक्ति की तब तक रक्षा […]
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तृतीय भाव का परिचय– तृतीय भाव प्रथम उपचय स्थान है| यह अपोक्लिम भावों की श्रेणी में भी आता है| उपचय स्थान का अर्थ है वृद्धि या बढोतरी का स्थान| इस भाव से जातक के अनुज सहोदरों के संबंध में ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है| यदि 12 भावों को धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष इन […]
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द्वितीय भाव का परिचय- कुडंली का द्वितीय भाव किसी भी व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण है| इसे धन भाव भी कहा जाता है| इस भाव से धन-धान्य, संपति, कुटम्ब, वाणी, नेत्र, भोजन मुख, विद्या, संचित धन, स्वर्ण, रजत आदि मूल्यवान वस्तुएं, वाक्पटुता, गायन कला तथा सत्य-असत्य भाषण आदि का विचार किया जाता है| द्वितीय भाव के […]
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प्रथम भाव जन्मकुंडली का सबसे महत्वपूर्ण भाव है| इसे लग्न भी कहा जाता है| लग्न का अर्थ है-लगा हुआ युक्त अथवा संलग्न| किसी भी व्यक्ति के जन्म के समय पूर्वी क्षितिज पर जो राशि विद्यमान होती है, वही उस व्यक्ति की लग्न बन जाती है| लग्न क्यों महत्वपूर्ण है? इसलिए क्योंकि इसी राशि विशेष के […]
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