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मुखपृष्ठ>आर्द्रा नक्षत्र

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आर्द्रा (नम) (मिथुन राशि में 6°40′ से 20°00′ तक)

रात्रि के आकाश में आर्द्रा ओरियन के अंतर्गत बीटलगुएज़ (अल्फा-ओरियन) नामक सबसे उज्जवल नक्षत्र के रूप में चमकता हुआ दिखाई देता है| ज्योतिष में आर्द्रा नक्षत्र संपूर्ण रूप से मिथुन राशि के अंतर्गत आता है| इस नक्षत्र का प्रतीक अश्रु है जो दुख व नवीकरण दोनों को दर्शाता है। आर्द्रा नक्षत्र में उत्पन्न होने वाले लोगों को आमतौर पर पुराने कार्मिक अनुभवों का भोग करके नई सोच विकसित करने के लिए गहन शिक्षाओं से गुजरना पड़ता है| इस नक्षत्र के अधिपति तूफ़ान के देवता रूद्र हैं| वह भगवान शिव का विनाशकारी रूप हैं जो अराजकता व भ्रम उत्पन्न करते हैं| आर्द्रा नक्षत्र का स्वामी राहु भी अव्यवस्था व ज्ञान की प्यास उत्पन्न करता है| इस नक्षत्र में उत्पन्न लोगों के पास एक खोजी मन होता है तथा वे अनुसंधान की ओर उन्मुख होते हैं। वे किसी के डराने-धमकाने से नहीं डरते हैं| आर्द्रा नक्षत्र का उच्चतम स्तर परिमार्जन के माध्यम से परिवर्तन करना है। यह एक अत्यंत संवेदनशील नक्षत्र है जो भावनाओं को मानसिक क्षमता से जोड़ता है।

Arudra Nakshatra

सामान्य विशेषताएँ: इच्छा से प्रेरित; भावुक शोधकर्ता; खोजी मन व तत्व विचारक
अनुवाद: “नम”, “ताज़ा”, “नया ”
प्रतीक: अश्रु, हीरा
पशु प्रतीक: कुतिया
अधिपति देव: विनाश व तूफ़ान के देवता रूद्र
शासक ग्रह: राहु
राहु ग्रह के अधिपति देव: दुर्गा
प्रकृति: मनुष्य(मानव)
ढंग: संतुलित
संख्या: 6
लिंग: स्त्री
दोष: वात
गुण: तामसिक
तत्व: जल
प्रकृति: तीक्ष्ण व सशक्त
पक्षी: अंद्रिल
वृक्ष:
सामान्य नाम: पिप्पली
वानस्पतिक नाम: पिप्पली
बीज ध्वनि: कु, घ, ड०, छ
ग्रह से संबंध: मिथुन राशि के स्वामी के रूप में बुध इस नक्षत्र से संबंधित है|

प्रत्येक नक्षत्र को चार चरणों में विभाजित किया जाता है जिन्हें पद कहते हैं| आर्द्रा नक्षत्र के विभिन्न पदों में जन्म लेने वाले लोगों के अधिक विशिष्ट लक्षण होते हैं:

पद:

प्रथम पद 00°00′ – 03°19′ मिथुन राशि का 06° 40′ -10° 00’ भाग गुरु ग्रह द्वारा शासित
शासित
ध्वनि: कु
सूचक शब्द: जिज्ञासा
द्वितीय पद 00°00′ – 03°19′ मिथुन राशि का 10° 00′ -13° 20′ भाग शनि ग्रह द्वारा शासित
शासित
ध्वनि: घ
सूचक शब्द: भौतिक
तृतीय पद 00°00′ – 03°19′ मिथुन राशि का 13° 20′ -16° 40′ भाग शनि ग्रह द्वारा शासित
शासित
ध्वनि: ड० घ
सूचक शब्द: अनुसंधान
चतुर्थ पद 00°00′ – 03°19′ मिथुन राशि का 16° 40′ – 20° 00′ भाग गुरु ग्रह द्वारा शासित
शासित
ध्वनि: छ
सूचक शब्द: दयालु

शक्ति: उत्सुक मानसिकता, ज्ञान के प्रति भूख, त्वरित कार्रवाई, उत्तम याददाश्त शक्ति, मानसिक काम करने के बजाय शारीरिक काम को अधिक पसंद करने वाला, आसानी से सरकार का समर्थन प्राप्त करने वाला, महान संप्रेषक, सत्यवादी, पीड़ित लोगों के प्रति करुणामय, एक समय विशेष पर बुरी आदतों को त्यागने वाला|

कमजोरियाँ: अभिमानी, शक्ति का दुरूपयोग करने वाला, भौतिक सुखों के प्रति लालची, कृतघ्न, लापरवाह, असामाजिक, दूसरों को परेशान करने वाला, आत्म सेवारत, बेईमान, जिद्दी, आलोचनात्मक, असभ्य, कुटिल, वित्तीय योजना बनाने में खराब, अतिभोग, दूसरों को पीड़ा व परेशानी देने वाला, हिंसक, शिकायतें करने वाला|

कार्यक्षेत्र: शारीरिक श्रम, इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटर, सॉफ्टवेयर अभियंता, विद्युत अभियंता, ध्वनि तकनीशियन, इलेक्ट्रॉनिक संगीत, वीडियो गेम विकासक, 3 डी प्रौद्योगिकी व विशेष प्रभाव, विज्ञान कथा लेखक, भाषाविद, फोटोग्राफर, दार्शनिक, भौतिक विज्ञानी, शोधकर्ता, शल्य चिकित्सक, औषधि निर्माता, जहरीले पदार्थ से संबंधित कार्य करने वाला, परमाणु ऊर्जा उद्योग, मनोचिकित्सक, स्नायु-विशेषज्ञ; जासूस, बिक्री विशेषज्ञ, विश्लेषक, राजनेता, चोर, शतरंज खिलाड़ी

रोहिणी नक्षत्र में जन्में प्रसिद्ध लोग: बेब रुथ, एफ.डी. रूजवेल्ट, हम्फ्री बोगार्ट, जैक्स कस्टू, वीनस विलियम्स, जुडी गारलैंड, फ्रैंक लॉयड राइट

अनुकूल गतिविधियां: विनाश, विरोध, संरचनाओं को ढहाना, कठिन परिस्थितियों को संभालना, शोध, पुराने चीजों से छुटकारा पाना, बुरी आदतों को छोड़ना, समस्याओं को संबोधित करना, नकारात्मकता को समाप्त करना।

प्रतिकूल गतिविधियां: एक परियोजना या कार्य का प्रारंभ; विवाह व धार्मिक समारोह; किसी का सम्मान करना; यात्रा।
पवित्र मंदिर: तिरुवाधिराई अधिरामपट्टिनम श्री अभयवरथीश्वर

आर्द्रा नक्षत्र से संबंधित यह पवित्र मंदिर भारत में तमिलनाडु के पट्टुककोट्टई के निकट स्थित है। आर्द्रा नक्षत्र में पैदा हुए लोगों को अपने जीवनकाल में एक बार इस पवित्र मंदिर के दर्शन करके यहाँ पूजा-अर्चना अवश्य करनी चाहिए|

आर्द्रा नक्षत्र में पैदा हुआ अधिवीरारमण नामक एक सम्राट इस पवित्र मंदिर में पूजा-अर्चना करता था। उसने इस मंदिर के ढाँचे की मरम्मत करवाकर देवताओं को भोग अर्पित किया इसलिए इस मंदिर का नाम अधिरामपट्टिनम रखा गया| आर्द्रा नक्षत्र में पैदा हुए लोगों के लिए यह एक दुर्लभ मंदिर है| यहाँ भगवान शिव के तीसरे नेत्र से उत्सर्जित उज्ज्वल प्रकाश को रैवत ऊर्जा कहा जाता है। वर्ष में एक बार यह प्रकाश संपूर्ण संसार तक पहुँचता है। ऐसा मर्कज्ही माह में आर्द्रा नक्षत्र दिवस पर होता है इसलिए इसे आर्द्रा दर्शन दिवस भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त इस प्रकाश को ग्रहण करने वाली भूमि को अधिरामपट्टिनम के नाम से जाना जाता है|

आर्द्रा नक्षत्र जिसे तिरुवाधिरै के नाम से भी जाना जाता है, भगवान शिव से संबंधित नक्षत्र है जबकि श्रवण नक्षत्र जिसे तिरुवोनम के नाम से भी जाना जाता है भगवान विष्णु से जुड़ा हुआ है। उपसर्ग थीरू का अर्थ “श्री” या “संपदा” है। ज़रूरतमंद लोगों के प्रति भगवान शिव महान करुणामय हैं तथा प्रदोष दिवस व आर्द्रा नक्षत्र दिवस पर वह उन्हें अभयारण्य प्रदान करते हैं। आर्द्रा नक्षत्र का क्षेत्र संसार में एक ऐसा स्थान हैं जहां भगवान शिव इन दिवसों के दौरान एक सुरक्षित आश्रय प्रदान करते हैं| आर्द्रा नक्षत्र से जुड़े इस पवित्र क्षेत्र में यदि कोई एक अनैतिक कार्य करता है तो उन्हें भगवान श्री अभयवरथीश्वर की कृपा से अपने कर्म को सुधारने के लिए भक्ति का सहारा लेना चाहिए।

आर्द्रा नक्षत्र दिवस व सोमवार को आर्द्रा नक्षत्र में पैदा हुए लोग इस अधिरामपट्टिनम मंदिर में जाकर ग़रीबों को भोजन, बादाम, कद्दू, जीरा और कटहल आदि दान कर सकते हैं। यह दान पाप ग्रहों के गोचर से उत्पन्न दोषों को दूर करेगा|

आर्द्रा नक्षत्र में जन्में लोगों के लिए वेदों द्वारा निर्धारित धूप पिप्पली नामक जड़ी-बूटी से निर्मित है|

इस धूप को जलाना उस विशिष्ट नक्षत्र हेतु एक लघु यज्ञ अनुष्ठान करने के समान है| एक विशिष्ट जन्मनक्षत्र के निमित किए गए इस लघु अनुष्ठान द्वारा आप अपने ग्रहों की आन्तरिक उर्जा से जुड़कर सकारात्मक परिणाम प्राप्त करने में सक्षम होंगे|

एक विशिष्ट नक्षत्र दिवस पर अन्य नक्षत्र धूपों को जलाने से आप उस दिन के नक्षत्र की ऊर्जा से जुड़कर अनुकूल परिणाम प्राप्त करते हैं| आपको यह सलाह दी जाती है कि आप कम से कम अपने व्यक्तिगत नक्षत्र से जुड़ी धूप को प्रतिदिन जलाएं ताकि आपको उस नक्षत्र से जुड़ी सकारात्मक उर्जा प्राप्त होती रहे|

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