
विवाह भारतीय संस्कृति में केवल एक सामाजिक संबंध
नहीं, बल्कि दो परिवारों और दो जीवन दृष्टियों का संगम माना जाता है। जब विवाह सही समय पर न हो पाए या बार-बार रुकावटें आएं, तो व्यक्ति और परिवार दोनों मानसिक तनाव का अनुभव करते हैं।
कई लोग योग्य, शिक्षित और सक्षम होने के बावजूद विवाह में देरी का सामना करते हैं। ऐसी स्थिति में अक्सर यह प्रश्न उठता है — क्या यह केवल परिस्थितियों का परिणाम है, या कुंडली में कोई ज्योतिषीय कारण भी हो सकता है?
वैदिक ज्योतिष के अनुसार, विवाह में देरी का संबंध ग्रहों की स्थिति, सप्तम भाव (विवाह भाव) और संबंधित दशाओं से हो सकता है। इस लेख में हम शांत और व्यावहारिक दृष्टिकोण से विवाह में देरी के कारण और उनके प्रभावी उपाय समझेंगे।
कुंडली का सातवां भाव विवाह और जीवनसाथी से संबंधित होता है।
यदि:
तो विवाह में बाधाएं आ सकती हैं।
विवाह के मुख्य कारक ग्रह माने जाते हैं:
यदि ये ग्रह:
तो विवाह योग में देरी संभव है।
जब मंगल 1, 4, 7, 8 या 12वें भाव में स्थित होता है, तो इसे मांगलिक स्थिति माना जाता है। हालांकि हर मांगलिक दोष विवाह में बाधा नहीं डालता, लेकिन कुछ स्थितियों में यह देरी का कारण बन सकता है।
ऐसी स्थितियों में विवाह संबंधी निर्णयों में विलंब हो सकता है।
कभी-कभी विवाह का योग मौजूद होने के बावजूद प्रतिकूल दशा-अंतरदशा के कारण समय अनुकूल नहीं बन पाता।
ज्योतिष केवल कारण बताने तक सीमित नहीं है, बल्कि संतुलित समाधान भी प्रदान करता है। इन उपायों को श्रद्धा और सकारात्मक सोच के साथ करना आवश्यक है।
शुक्र ग्रह को मजबूत करने के लिए:
यह उपाय विवाह योग को सशक्त करने में सहायक माना जाता है।
विशेषकर महिलाओं के लिए:
सोमवार को:
शिव आराधना मानसिक शांति और विवाह संबंधी बाधाओं को कम करने में सहायक मानी जाती है।
यह शनि की शांति के लिए किया जाता है।
रत्न धारण करने से पहले योग्य ज्योतिषी की सलाह अवश्य लें।
विवाह में देरी जीवन का अंत नहीं, बल्कि समय का एक चरण है। ज्योतिष हमें दिशा दिखाता है, लेकिन धैर्य और सकारात्मक सोच सबसे महत्वपूर्ण तत्व हैं।
जब श्रद्धा, सही मार्गदर्शन और संतुलित प्रयास साथ आते हैं, तो जीवन में शुभ अवसर अवश्य आते हैं।