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रोहिणी (10°00′ to 23°20′ वृषभ)
रोहिणी नक्षत्र पूरी तरह से वृषभ राशि में समाविष्ट है| रात के समय आकाश में यह एक उज्ज्वल तारे जिसे अल्देबारन(अल्फा-टौरी) कहा जाता है के अंतर्गत चमकता नज़र आता है| रोहिणी शब्द का अर्थ “लाल वर्ण वाला” है जो इस नक्षत्र की तीव्र व प्रचुर जोशपूर्ण प्रवृति का प्रतीक है| इस नक्षत्र की प्रतीक बैल गाड़ी वाणिज्य, उर्वरता तथा सामान या विचारों के आदान-प्रदान की क्षमता को दर्शाती है। इस नक्षत्र के देवता भगवान ब्रह्मा हैं जो रोहिणी नक्षत्र को एक रचनात्मक और भौतिकतावादी प्रकृति प्रदान करते हैं| रोहिणी नक्षत्र में पैदा हुए लोगों में महान प्रतिभा होती है तथा वे दूसरों का ध्यान आकर्षित करने के लिए अपने आकर्षण का उपयोग करते हैं। इस नक्षत्र की उर्वर प्रकृति रोहिणी नक्षत्र में पैदा हुए लोगों को अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करती है क्योंकि उनके पास अपने विचारों को व्यक्त करने तथा रचनाओं को अमल में लाने की क्षमता होती है। चंद्रमा और शुक्र जैसे स्त्री ग्रहों के प्रभाव के कारण इस नक्षत्र में ग्रहणशीलता और पोषण के गुण होते हैं। जो लोग रोहिणी नक्षत्र में पैदा होते हैं उनकी पारिवारिक मान्यता सुदृढ़ होती है तथा वे सुंदरता, कला और विलासिता के प्रति आकर्षित होते हैं|
सामान्य विशेषताएँ: ईमानदार; उदार; सुंदर; बातचीत में विनम्र; स्थिर दृष्टिकोण व विचार; आध्यात्मिक मुक्ति पर ध्यान केंद्रित|
अनुवाद; लाल वर्ण वाला” या “बढ़ने वाला”
प्रतीक: एक बैलगाडी ; रथ
पशु प्रतीक: एक नाग
अधिपति देव: ब्रह्मा जी, सृष्टि के निर्माता
शासक ग्रह: चंद्र
चंद्र ग्रह के अधिपति देव:: पार्वती
प्रकृति: मनुष्य (मानव)
ढंग: संतुलित
संख्या: 4 (भौतिक दुनिया से संबंधित है|)
लिंग: स्त्री
दोष: कफ
गुण: रजस
तत्व: पृथ्वी
प्रकृति: स्थिर, स्थायी(ध्रुव)
पक्षी: उल्लू
वृक्ष:
सामान्य नाम: जामुन
वानस्पतिक नाम: : सिजीगियम जीरा
बीज ध्वनि: ओ, वा, वी, वू (रोहिणी के पद देखें)
ग्रह से संबंध वृषभ राशि के स्वामी के रूप में शुक्र इस नक्षत्र से संबंधित है|

प्रत्येक नक्षत्र को चार चरणों में विभाजित किया जाता है जिन्हें पद कहते हैं| रोहिणी नक्षत्र के विभिन्न पदों में जन्म लेने वाले लोगों के अधिक विशिष्ट लक्षण होते हैं:
पद:
| प्रथम पद | वृषभ राशि का 10° 00′ – 13° 20′ भाग मंगल ग्रह द्वारा शासित ध्वनि: ओ सूचक शब्द: जोश |
द्वितीय पद | वृषभ राशि का 13° 20′ – 16° 40′ भाग शुक्र ग्रह द्वारा शासित ध्वनि: वा सूचक शब्द: प्रचुरता |
तृतीय पद | वृषभ राशि का 16° 40′ – 20° 00′ भाग बुध ग्रह द्वारा शासित ध्वनि: वी सूचक शब्द: लचीलापन |
चतुर्थ पद | वृषभ राशि का 20° 00′ – 23° 20′ भाग चंद्र ग्रह द्वारा शासित ध्वनि: वू सूचक शब्द: सुख |
शक्ति: रूपवान, आकर्षक, उत्तम वक्ता और श्रोता, मनमोहक, आंतरिक शक्ति, दूसरों पर प्रभाव डालने वाला, मजबूत सामाजिक जीवन, सौम्य स्वभाव, सौहार्दपूर्ण, सत्यवादी, नैतिक रूप से उन्मुख, शांतिपूर्ण बातें करने वाला, तेज, संतुलित मन वाला, उद्देश्य के प्रति दृढ, सुशिक्षित, आर्थिक रूप से मजबूत , परिवार के लिए कर्तव्यपरायण, जिम्मेदार, उपयोगी, कला के क्षेत्र में प्रतिभाशाली, स्वस्थ, मैत्रीपूर्ण, ईर्ष्या रहित।
कमजोरियाँ: दयालु, भौतिकतावादी, धोखे और हेराफेरी से दूसरों से लाभ उठाने वाला, लैंगिक दृष्टि से इंद्रियासक्त, दूसरों की आलोचना करने वाला, अधिकारात्मक, ईर्ष्यापूर्ण, अत्यधिक संवेदनशील, अस्थिर प्रकृति, व्यसनी, दुविधाग्रस्त|
कार्यक्षेत्र कृषि, खेती-बाड़ी, खाद्य प्रौद्योगिकी, वनस्पति वैज्ञानिक, औषधि विशेषज्ञ, कलाकार, संगीतकार, मनोरंजन उद्योग, सौन्दर्य-प्रसाधन उद्योग, सेक्स चिकित्सक, सुनार, रत्न व्यवसायी, आंतरिक सज्जाकार,
बैंककर्मी, परिवहन व्यवसाय, पर्यटन, मोटर-गाड़ी उद्योग, तेल और पेट्रोलियम संबंधी व्यवसाय, कपड़ा उद्योग,
जलयात्रा संबंधी उद्योग, पैकेजिंग और वितरण तथा जलीय उत्पाद व तरल पदार्थ से संबंधित व्यवसाय|
रोहिणी नक्षत्र में जन्में प्रसिद्ध लोग: श्री कृष्ण, रानी विक्टोरिया, बराक ओबामा, चार्ली चैपलिन
अनुकूल गतिविधियां: किसी भी नए कार्य की शुरुआत करना, वस्त्र, आभूषण, वाहन ख़रीदना, वित्तीय मामले व व्यापार, चिकित्सा, आत्म सुधार, बागवानी, खेती, प्रकृति, यात्रा, विवाह, रोमांस और यौन क्रियाकलापों में समय व्यतीत करना।
प्रतिकूल गतिविधियां: मृत्यु व विनाश को छोड़कर अधिकांश गतिविधियों के लिए अनुकूल
पवित्र मंदिर: कांचीपुरम श्री पांडव दूत श्री कृष्ण पेरुमल
रोहिणी नक्षत्र में उत्पन्न लोगों के लिए सर्वाधिक महत्व रखने वाला यह मंदिर भारत में तमिलनाडु के कांचीपुरम शहर में स्थित है। यह मंदिर कुमारककोट्टम, श्री मुरुगन मंदिर व श्री कामाक्षी अम्मान मंदिर के निकट भी है।
इस पवित्र स्थल पर रोहिणी देवी ने पूरी भक्ति के साथ भगवान कृष्ण की पूजा-अर्चना द्वारा आत्मज्ञान प्राप्त किया था| 27 नक्षत्रों में से प्रत्येक नक्षत्र को चंद्रमा की पत्नी माना गया है लेकिन रोहिणी देवी से सर्वप्रथम चंद्रमा का विवाह हुआ था| थान्थरीश्वर मंदिर में अपने दाहिने पैर के एक अंगूठे पर खड़े होकर एक कल्प तक तपस्या करने के बाद उन्होंने विवाह का यह आशीर्वाद प्राप्त किया था| रोहिणी ने कांचीपुरम में श्री पांडव दूत श्रीकृष्ण मंदिर में भगवान कृष्ण की पूजा-अर्चना की थी| इसके उपरांत ही रोहिणी को भगवान कृष्ण के दर्शन के द्वारा वास्तविक अंतर्दृष्टि व दिव्य आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई थी|
महाभारत में दुर्योधन की कहानी का वर्णन है जो भगवान कृष्ण को चतुरता से पराभूत करने का प्रयास कर रहा था। दुर्योधन ने भगवान कृष्ण के साथ छल करने प्रयास किया ताकि वह उनका आसानी से वध कर सकें। माया के स्वामी भगवान कृष्ण भी उसके साथ खेल रहे थे लेकिन इससे पूर्व कि दुर्योधन उनके साथ छल कर पाता भगवान कृष्ण ने अपनी वास्तविक ब्रह्मांडीय प्रकृति श्री पांडव दूत पेरुमल के रूप में प्रकट की। इस पवित्र शुभ मंदिर में भगवान कृष्ण की 30 फीट लंबी प्रतिमा स्थित है जिसके द्वारा वह संपूर्ण ब्रह्मांड को स्वयं में समाविष्ट करते हुए अपना अनुग्रह प्रदान करते हैं।
रोहिणी नक्षत्र में पैदा हुए लोगों को अपने जीवनकाल में एक बार भगवान श्री कृष्ण के दर्शन हेतु इस मंदिर की यात्रा अवश्य करनी चाहिए| इस पवित्र मंदिर में अपने कर्मों को शुद्ध करने हेतु परिवार व मित्रजनों के साथ जाकर गरीब लोगों को अन्नदान करने की सलाह दी जाती है| भगवान श्री कृष्ण के प्रिय भोग अदाई (चावल से बना मालपुआ), मुरुकू (चावल की टिकिया) व सीदई (चावल, नारियल व तिल से निर्मित मीठे पकवान) हैं। यह भी कहा जाता है कि दुखों से मुक्ति हेतु हाथ में घी का एक दीपक रखते हुए इस मंदिर के चारों ओर से बाएं से दाएं परिक्रमा करनी चाहिए| यह मंदिर प्रचुरता का प्रतीक है तथा रोहिणी नक्षत्र दिवस या अष्टमी पर इस मंदिर के दर्शन करने से समृद्धि की प्राप्ति होती है|
रोहिणी नक्षत्र में जन्में लोगों के लिए वेदों द्वारा निर्धारित धूप जामुन नामक जड़ी-बूटी से निर्मित है|
इस धूप को जलाना उस विशिष्ट नक्षत्र हेतु एक लघु यज्ञ अनुष्ठान करने के समान है| एक विशिष्ट जन्मनक्षत्र के निमित किए गए इस लघु अनुष्ठान द्वारा आप अपने ग्रहों की आन्तरिक उर्जा से जुड़कर सकारात्मक परिणाम प्राप्त करने में सक्षम होंगे|
एक विशिष्ट नक्षत्र दिवस पर अन्य नक्षत्र धूपों को जलाने से आप उस दिन के नक्षत्र की ऊर्जा से जुड़कर अनुकूल परिणाम प्राप्त करते हैं| आपको यह सलाह दी जाती है कि आप कम से कम अपने व्यक्तिगत नक्षत्र से जुड़ी धूप को प्रतिदिन जलाएं ताकि आपको उस नक्षत्र से जुड़ी सकारात्मक उर्जा प्राप्त होती रहे|
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| अश्विनी | मघा | मूल |
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