AstroVed Menu
AstroVed
search
HI language
x
cart-added The item has been added to your cart.
x

मृगशिरा नक्षत्र

मुख पृष्ठ> मुफ्त उपकरण>मुखपृष्ठ>मृगशिरा नक्षत्र

मृगशिरा(हिरण का मुख) (23°20′ वृषभ राशि से 6°40′ मिथुन राशि तक)

रात्रि के आकाश में मृगशिरा नक्षत्र के चार तारे ओरियन नामक सितारे के अंतर्गत चमकते हुए दिखाई देते हैं| इन चार तारों के नाम बेलाट्रिक्स (गामा-ओरियनिस), पी.आई 2, पी. आई 3 व पी. आई 4-ओरियनिस हैं| बेलाट्रिक्स इन तारों में सबसे अधिक उज्ज्वल है तथा ओरियन के दाहिनी ओर स्थित है। ये तारे एक हिरण के सिर की आकृति बनाते हैं जो मृगशिरा नक्षत्र का प्रतीक है। भारतीय ज्योतिष में मृगशिरा नक्षत्र वृषभ व मिथुन राशि में समाविष्ट है| मृगशिरा नक्षत्र में पैदा हुए जातक सौम्य व आकर्षक प्रकृति के होते हैं तथा लगातार ज्ञान की ख़ोज करते रहते हैं| उनमें मानसिक चतुरता के साथ-साथ ज्ञानार्जन करने की महान क्षमता होती है| उन्हें कार्य का अत्यधिक बोझ लेने या अशांत होने से बचना चाहिए| उन्हें शारीरिक रूप से सक्रिय रहने पर संतुलन बनाने में सहायता मिलती है| मृगशिरा नक्षत्र को समस्त नक्षत्रों में सबसे अधिक जिज्ञासु माना गया है तथा ऐसे जातकों में उत्तम हास्यवृत्ति होती है| मृगशिरा नक्षत्र विविधता से संबंधित है तथा इस नक्षत्र में उत्पन्न जातक अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य को खोजने के लिए विभिन्न अनुभवों से गुजरते हैं|

mrigashira-nakshatra

सामान्य विशेषताएँ स्व प्रेरित; कार्य उन्मुख; सक्षम परंतु डरपोक; अनुसंधान व सार्वजनिक भाषण की कला में
निपुण; आध्यात्मिक बुद्धि; मोक्ष की चाह
अनुवाद: “हिरण का सिर” या “उदार”
प्रतीक: मृग का शीश
पशु प्रतीक: नागिन
अधिपति देव: सोम, चंद्र के देवता
शासक ग्रह: मंगल
मंगल ग्रह के अधिपति देव: मुरुगा
प्रकृति: देव(देव समान)
ढंग: दब्बू
संख्या: 5
लिंग: नपुंसक
दोष: पित्त
गुण: तामसिक
तत्व: पृथ्वी
प्रकृति: नम्र, सौम्य, मृदु
वृक्ष:
सामान्य नाम: मिलमेषा
वानस्पतिक नाम: : बबूल खैर
बीज ध्वनि: वी, वो, का, की
गग्रह से संबंध: वृषभ राशि के स्वामी के रूप में शुक्र तथा मिथुन राशि के स्वामी के रूप में बुध इस नक्षत्र से संबंधित है|

प्रत्येक नक्षत्र को चार चरणों में विभाजित किया जाता है जिन्हें पद कहते हैं| मृगशिरा नक्षत्र के विभिन्न पदों में जन्म लेने वाले लोगों के अधिक विशिष्ट लक्षण होते हैं:

पद::

प्रथम पद वृषभ राशि का 23° 20′ – 26° 40′ भाग सूर्य ग्रह द्वारा
शासित
ध्वनि: वी
सूचक शब्द: अर्थपूर्ण
द्वितीय पद वृषभ राशि का 26° 40′ – 30° 00′ भाग बुध ग्रह द्वारा
शासित
ध्वनि: वो
सूचक शब्द: विवेक
तृतीय पद मिथुन राशि का 00° 00′ – 3° 20′ भाग शुक्र ग्रह द्वारा
शासित
ध्वनि: का
सूचक शब्द: सामाजिक
चतुर्थ पद मिथुन राशि का 3° 20′ – 6° 40′ भाग मंगल ग्रह द्वारा
शासित
ध्वनि: की
सूचक शब्द: बौद्धिक

शक्ति: सशक्त व्यक्तित्व, तेज और बुद्धिमान, प्राकृतिक रूप से नेता, कार्य उन्मुख, मजाकिया, उत्सुक, नए ज्ञान की तलाश करता है, समझदार और संवेदनशील, उत्तम वस्त्रों व सामान का शौक़ीन, जीवन में कई सुख प्राप्त करता है, गायन, लेखन, वादन और बातचीत का शौक़ीन, रचनात्मक, अनेक विषयों पर स्पष्ट बोलने वाला, तर्क व बहसबाजी में आनंद लेने वाला, उत्साही, युवा, चतुर, उत्सुक, आशावान, तेजी से सीखने की क्षमता, मैत्रीपूर्ण, मज़ेदार, अनेक मित्र व प्रेम में रुझान, कामुक, कठोर परिश्रमी, संपन्न|

कमजोरियाँ: आवेशपूर्ण, चुलबुला, चंचल, निरंतर ध्यान की जरुरत, अनेक साझेदारियां, उत्तेजना की लालसा, वचनबद्धता न निभाने वाला, अधिक उत्तेजना द्वारा परेशानियाँ , आसानी से कामोत्तेजित, अस्त-व्यस्त, आलोचनात्मक, वार्तालाप में कष्टकारी, असहाय, संदिग्ध, असंतुलित, आलोचना के प्रति संवेदनशील|

रोहिणी नक्षत्र में जन्में प्रसिद्ध लोग:: वाल्टर मोंडेले, शर्ली टेम्पल ब्लैक, ब्रुक शील्ड, रॉडिन, डोरिस डे, गोल्डी हॉर्न

कार्यक्षेत्र: कलाकार; गायक; संगीतकार; लेखक; कवि; चित्रकार; दार्शनिक; रत्न उद्योग; पृथ्वी से संबंधित उत्पाद या सामग्री; किसान; भूमि विकासक; सर्वेक्षक; मानचित्रकार; यात्री; खोजकर्ता; भवन-निर्माण ठेकेदार, कल-पुर्जे या इलेक्ट्रॉनिक्स से संबंधित व्यवसाय; पशुचिकित्सा या पालतू पशुओं से संबंधित व्यवसाय; वेश-भूषा और वस्त्र उद्योग; बिक्री प्रतिनिधि; विज्ञापन; प्रसारणकर्ता; प्रशासन; दिव्यदृष्टा, ज्योतिषी; शिक्षक।

अनुकूल गतिविधियां:: कला और रचनात्मक व्यवसाय; सामाजिक मुलाक़ातें व नए मित्र बनाना; सेक्स; यात्रा; अन्वेषण; शिक्षा ग्रहण करना, नए स्थान पर गतिमान होना; स्वास्थ्य व नवजीवन प्राप्त करने से जुड़े कार्य; बागवानी; विज्ञापन; आध्यात्मिक दीक्षा संस्कार

प्रतिकूल गतिविधियां: कठोर व आवेशपूर्ण कार्य जैसे विरोध या युद्ध; विवाह, अनुष्ठान; दीर्घकालिक निर्णय
पवित्र मंदिर: एन्न्कन्न श्री आदि नारायण पेरुमल

यह पवित्र श्री आदि नारायण पेरुमल मंदिर भारत में तमिलनाडु के एन्न्कन्न गाँव में कोरादाचेरी के निकट स्थित है| मृगशिरा नक्षत्र में पैदा हुए लोगों को अपने जीवनकाल में एक बार इस पवित्र मंदिर के दर्शन करके यहाँ पूजा-अर्चना अवश्य करनी चाहिए|

श्री आदि नारायण पेरुमल मंदिर की कथा एक सम्राट की कहानी से शुरू होती है जो जंगल में पशुओं का शिकार करता था। एक बार इस सम्राट ने भृगु महर्षि के ध्यान को भंग कर दिया जो उस समय अपनी तपस्या में लीन थे। इससे क्रोधित होकर भृगु महर्षि ने सम्राट को सिंह मुख बन जाने का शाप दे डाला तथा सम्राट के पास इस शाप से मुक्ति पाने का एकमात्र तरीका एक शालीन जीवन का पालन करना था।

श्री आदि नारायण पेरुमल मंदिर की ऊर्जा एक पौराणिक पक्षी गरुड़ की कृपा का आवाहन करती है जो भगवान विष्णु को श्री आदि नारायण पेरुमल रूप में एक स्थल से दूसरे स्थल ले जाता था| महर्षि भृगु ने सम्राट को इस मंदिर में भगवान विष्णु के सम्मान में एक पर्व का आयोजन करने की सलाह दी जिसमें उसे भगवान विष्णु को एक सिंह, एक बैल, एक मोर, एक हंस व एक भेड़ से जूते यान पर लेकर जाना था| सम्राट ने महर्षि भृगु की आज्ञा का पालन किया| उसने इस मंदिर का जीर्णोद्धार किया तथा इस पवित्र स्थल पर भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की| जिसके पश्चात सम्राट का सिंह मुख वाला रूप तत्काल ठीक हो गया तथा उसने आनंदपूर्वक मन्दिर में भक्ति संबंधी शिक्षाएं देनी प्रारंभ कर दी| उसने एक भव्य पर्व का आयोजन किया जिसमें भगवान विष्णु को ले जाने के लिए 108 वाहनों की व्यवस्था की थी। इस पर्व ने विशिष्ट व्यक्तियों, वास्तुकारों व मूर्तिकारों को मंदिर की ओर आकर्षित करना शुरू कर दिया|

इस मंदिर की शुभ ऊर्जा अपने व्यवसाय या नौकरी से संबंधित मामलों के प्रति चिंतित लोगों की सहायता कर सकती है। मृगशिरा नक्षत्र दिवस विष्णुपति दिवस, बुधवार व शनिवार को यहाँ अभिषेक करना लाभदायक होता है| इसके अतिरिक्त यहाँ ग़रीबों को मीठा पेय बांटने से चिंताओं को दूर करने में मदद मिलेगी। घृत दीपक सहित इस मंदिर की परिक्रमा करना भी लाभकारी होता है| यह शत्रुओं के साथ चल रहे विवादों को कम करता है| यहाँ लोग अपनी प्रतिष्ठा को सुधारने हेतु गरीबों में मीठे चावल, दूध व मेवे बाँट सकते हैं और अंत में पवित्र पक्षी गरूड़ का तेल से अभिषेक करके भगवान विष्णु को मक्खन व चंदन लेप अर्पित करना समृद्धि व स्वास्थ्य हेतु अनुकूल है।

मृगशिरा नक्षत्र में जन्में लोगों के लिए वेदों द्वारा निर्धारित धूप आबनूस नामक जड़ी-बूटी से निर्मित है|

इस धूप को जलाना उस विशिष्ट नक्षत्र हेतु एक लघु यज्ञ अनुष्ठान करने के समान है| एक विशिष्ट जन्मनक्षत्र के निमित किए गए इस लघु अनुष्ठान द्वारा आप अपने ग्रहों की आन्तरिक उर्जा से जुड़कर सकारात्मक परिणाम प्राप्त करने में सक्षम होंगे|

एक विशिष्ट नक्षत्र दिवस पर अन्य नक्षत्र धूपों को जलाने से आप उस दिन के नक्षत्र की ऊर्जा से जुड़कर अनुकूल परिणाम प्राप्त करते हैं| आपको यह सलाह दी जाती है कि आप कम से कम अपने व्यक्तिगत नक्षत्र से जुड़ी धूप को प्रतिदिन जलाएं ताकि आपको उस नक्षत्र से जुड़ी सकारात्मक उर्जा प्राप्त होती रहे|

खरीदने के लिए यहां क्लिक करेंं

अश्विनी

मघा

मूल

भरणी

पूर्वाफाल्गुनी

पूर्वाषाढा

कृतिका

उत्तराफाल्गुनी

उत्तराषाढ़ा

रोहिणी

हस्त

श्रवण

मृगशिरा

चित्रा

धनिष्ठा

आर्द्रा

स्वाति

शतभिषा

पुनर्वसु

विशाखा

पूर्वाभाद्रपदा

पुष्य

अनुराधा

उत्तराभाद्रपद

अश्लेषा

ज्येष्ठा

रेवती

नवीनतम ब्लॉग्स

  • ज्योतिषीय उपायों में छुपा है आपकी आर्थिक समस्याओं का समाधान
    आज की दुनिया में, आर्थिक स्थिरता एक शांतिपूर्ण और सफल जीवन के प्रमुख पहलुओं में से एक है। फिर भी कई लोग कड़ी मेहनत के बावजूद लगातार आर्थिक परेशानियों, कर्ज या बचत की कमी का सामना करते हैं। अगर यह आपको परिचित लगता है, तो इसका कारण न केवल बाहरी परिस्थितियों में बल्कि आपकी कुंडली […]13...
  • ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों की भूमिका और कुंडली में प्रभाव
    भारतीय वैदिक ज्योतिष में ग्रहों का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। व्यक्ति के जन्म के समय आकाश में स्थित ग्रहों की स्थिति उसके जीवन के हर पहलू – जैसे स्वभाव, स्वास्थ्य, शिक्षा, विवाह, करियर, धन, संतान और आध्यात्मिकता पर गहरा प्रभाव डालती है।   जन्मकुंडली में ग्रहों की भूमिका जब कोई व्यक्ति जन्म लेता […]13...
  • पंचमुखी रुद्राक्ष का महत्व, लाभ और पहनने की विधि
    भारतीय संस्कृति और अध्यात्म में रुद्राक्ष को दिव्य मणि कहा गया है। इसे भगवान शिव का प्रतीक माना जाता है। रुद्राक्ष की हर मुखी के अलग-अलग गुण और प्रभाव होते हैं। इनमें से पंचमुखी रुद्राक्ष सबसे आम और अत्यंत शुभ माने जाने वाले रुद्राक्षों में से एक है। यह न केवल आध्यात्मिक साधना में सहायक […]13...