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उत्तराभाद्रपद नक्षत्र

उत्तराभाद्रपद (मीन राशि में 3°20′ से 16°40′ तक)

उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में गामा पेगासी व अल्फा एंड्रोमेडेई नामक दो तारे शामिल हैं जो आधुनिक खगोल विज्ञान में पेगासस और एंड्रोमेडा नामक दो तारों को आपस में जोड़ते हैं। अंतिम संस्कार की खाट का पिछला भाग उत्तराभाद्रपद का प्रतीक है जिसे यह पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र के साथ साझा करता है। यह नक्षत्र अग्नि शोधन व जुनून से भी संबंधित है लेकिन पूर्व नक्षत्र के मुकाबले कम आक्रामक है। उत्तराभाद्रपद के अधिपति देव अहिर्बुध्न्य हैं जो इस नक्षत्र में पैदा लोगों को गहराई से चीजों की जांच करने व कुंडलिनी ऊर्जा का अन्वेषण करने की इच्छा प्रदान करते हैं| इस नक्षत्र में उत्पन्न लोग दयालु व धार्मिक होते हैं तथा मानवतावादी कार्यों की ओर आकर्षित होते हैं| उन्हें चिंतन करने के लिए एकांत व समय की आवश्यकता होती है परंतु आलस्य व अलगाव के प्रति उन्हें सतर्क रहना चाहिए| उत्तराभाद्रपद नक्षत्र ज्ञान व दृढ़ संकल्प से परिपूर्ण है फिर भी सर्वोच्च उपलब्धि पाने के लिए धैर्य की आवश्यकता को समझता है।

सामान्य विशेषताएँ: प्रसन्न लोग, उत्तम वक्ता, शत्रुजीत, धार्मिक प्रकृति
अनुवाद: “जिसके पाँव भाग्यशाली हों”
प्रतीक: एक पलंग के पिछले दो पैर या अंतिम संस्कार की शय्या
पशु प्रतीक: एक गाय
अधिपति देव: अहिर्बुध्न्य, गहनता से परिपूर्ण सर्प जो उर्वरता व कुंडलिनी शक्ति से जुड़ा है|
शासक ग्रह: शनि
शनि ग्रह के अधिपति देव: हनुमान
प्रकृति: मनुष्य(मानव)
ढंग: संतुलित
संख्या: 26
लिंग: पुरुष
दोष: पित
गुण: तामसिक
तत्व: आकाश
प्रकृति: स्थिर
पक्षी: कोटन
सामान्य नाम: नीम
वानस्पतिक नाम: अज़दिराचता इंडिका
बीज ध्वनि: `दु, थ, झ, ञ
ग्रह से संबंध: मीन राशि के स्वामी के रूप में गुरु इस नक्षत्र से संबंधित है जो विस्तार देता है| जबकि केतु आध्यात्मिकता देता है|

uttarabhadrapada-nakshatra Hindi

प्रत्येक नक्षत्र को चार चरणों में विभाजित किया जाता है जिन्हें पद कहते हैं| उत्तराभाद्रपद नक्षत्र के विभिन्न पदों में जन्म लेने वाले लोगों के अधिक विशिष्ट लक्षण होते हैं:

पद:

प्रथम पद मीन राशि का 03°20′ – 06°40′ भाग सूर्य ग्रह द्वारा
शासित
ध्वनि: दु
सूचक शब्द: उपलब्धि
द्वितीय पद मीन राशि का 06°40′ – 10°00′ भाग बुध ग्रह द्वारा
शासित
ध्वनि: थ
सूचक शब्द: विश्लेषण
तृतीय पद मीन राशि का 10°00′ – 13°20′ भाग शुक्र ग्रह द्वारा
शासित
ध्वनि: झ
सूचक शब्द: सामंजस्य
चतुर्थ पद मीन राशि का 13°30′ – 16°40′ भाग मंगल ग्रह द्वारा
शासित
ध्वनि: ञ
सूचक शब्द: तीव्रता

शक्ति: आकर्षक, समस्या सुलझाने की उत्तम क्षमता, प्रेरक वक्ता, अनुशासित, दयालु, करुणामय, सिद्धांतवादी, संतुष्ट, उदार, विनम्र; आर्थिक रूप से संपन्न, स्वयं धन कमाने वाला, किफायती, दानी, मानवतावादी, रहमदिल, चतुर, संतान से लाभ, अज्ञात की ओर आकर्षित, धार्मिक, प्रसन्न, परिवार से प्रेम करने वाला, शत्रुओं को जीतने वाला, संतुष्ट, सेवा उन्मुख, गुस्से पर नियंत्रण रखने वाले, सुखी वैवाहिक जीवन, संतुलित, दूसरों को पोषण देने वाले, उत्तम सलाहकार

कमजोरियाँ: निष्कासित, उत्साहहीन, दीर्घकालिक दुश्मनों का समूह विकसित करने वाला या लंबे समय तक चलने वाले विवादों में लिप्त, स्वयं के परिणामों पर बहुत अधिक विचार करने वाला, आत्म केंद्रित, आर्थिक रूप से केंद्रित, बातूनी प्रकृति, आलसी, व्यसनी, गैर जिम्मेदार, अत्यधिक भावुक

कार्यक्षेत्र: दार्शनिक, लेखक, शिक्षक, दान कार्य, आयात या निर्यात कार्य, यात्रा उद्योग, धार्मिक कार्य, ज्योतिषी, योग व ध्यान विशेषज्ञ, परामर्शदाता, चिकित्सक, आरोग्य प्रदाता, तांत्रिक व्यवसायी, भिक्षु, संगीतकार, ऐसे कार्य जिनमें असाधारण क्षमताओं की आवश्यकता होती है, स्थिर प्रकृति के कार्य, चौकीदार, द्वारपाल, इतिहासकार, पुस्तकालयाध्यक्ष, विरासत से आजीवका कमाना

उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में जन्में प्रसिद्ध लोग: बिल गेट्स, हिलेरी क्लिंटन, इंदिरा गांधी

अनुकूल गतिविधियां: शांतिपूर्ण कार्य, अनुसंधान, ध्यान, मानसिक विकास, विवाह, यौन क्रियाकलाप, वित्तीय सौदे, ऐसे कार्य जिनमें दूसरों के सहयोग की आवश्यकता होती है, कलात्मक व्यापार, रोग उपचार, बच्चों का नामकरण, बागवानी, निर्माण, प्रतिबद्धता हेतु उत्तम समय

प्रतिकूल गतिविधियां: यात्रा, मुकदमेबाजी, शत्रुओं का सामना करना, सट्टेबाज़ी, जुआ, धन उधार देना, त्वरित कार्रवाई, शारीरिक गतिविधि

पवित्र मंदिर: थियाथथूर श्री सहस्र लक्ष्मीश्वर मंदिर

उत्तराभाद्रपद नक्षत्र की उर्जा से संबंधित श्री सहस्र लक्ष्मीश्वर मंदिर भारत में तमिलनाडु के पुदुक्कोट्टई के निकट थियाथथूर में स्थित है| उत्तराभाद्रपद नक्षत्र तीन पवित्र अग्नि कुण्डों से निर्मित है। मान्यता है कि देवी लक्ष्मी रोज उत्तराभाद्रपद नक्षत्र के अग्नि कुंड से कमल पुष्प इकट्ठा करती थी| देवी लक्ष्मी ने इस पवित्र मंदिर में स्थित शिवलिंग की 1008 स्वर्ण कमल पुष्पों से पूजा-अर्चना की थी| जिसके उपरांत थियाथथूर में भगवान शिव श्री सहस्र लक्ष्मीश्वर के रूप में प्रकट हुए थे|

श्री सहस्र लक्ष्मीश्वर शिवलिंग के दर्शन करने से किसी भी व्यक्ति के जीवन में असाधारण सकारात्मक बदलाव आ सकते हैं| देवी लक्ष्मी के दर्शन करने से समृद्धि व अनुग्रह की प्राप्ति होती है। जो लोग उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में पैदा हुए हैं उन्हें अपने जीवनकाल में एक बार इस पवित्र स्थल के दर्शन करके यहाँ पूजा-अर्चना अवश्य करनी चाहिए|

अन्य नक्षत्रों में जन्मे लोग भी इस मंदिर के दर्शन व पूजा-अर्चना करके लाभान्वित होंगे। यदि कोई व्यक्ति अपने हाथों से चंदन को पीसकर उसके द्वारा देवताओं का अभिषेक करता है तो श्री सहस्र लक्ष्मीश्वर जी की कृपा से उसे गर्मी से संबंधित रोगों के उपचार में सहायता मिल सकती है| इस मंदिर में ग़रीबों को फलों का रस या मिष्ठान बाँटना भी अनुकूल होता है।

थियाथथूर में स्थित यह पवित्र मंदिर यज्ञ अनुष्ठान करने के लिए एक विशेष स्थल है। थियाथथूर में कृष्णपक्ष की चतुर्थी व उत्तराभाद्रपद नक्षत्र दिवस के संयोजन (तिल कुंड चतुर्थी) पर श्री विनायक पेरुमन ने अपने विवाह समारोह के निमित एक यज्ञ अनुष्ठान संपन्न किया था| इस दिन यज्ञ अनुष्ठान करने से वित्तीय बाधाएं दूर होती हैं। उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में पैदा लोगों को अपने जीवनकाल में एक बार इस पवित्र स्थल पर आकर यज्ञ अनुष्ठान करने से शुभता की प्राप्ति होती है|

उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में जन्में लोगों के लिए वेदों द्वारा निर्धारित धूप नीम नामक जड़ी-बूटी से निर्मित है|

इस धूप को जलाना उस विशिष्ट नक्षत्र हेतु एक लघु यज्ञ अनुष्ठान करने के समान है| एक विशिष्ट जन्मनक्षत्र के निमित किए गए इस लघु अनुष्ठान द्वारा आप अपने ग्रहों की आन्तरिक उर्जा से जुड़कर सकारात्मक परिणाम प्राप्त करने में सक्षम होंगे|

एक विशिष्ट नक्षत्र दिवस पर अन्य नक्षत्र धूपों को जलाने से आप उस दिन के नक्षत्र की ऊर्जा से जुड़कर अनुकूल परिणाम प्राप्त करते हैं| आपको यह सलाह दी जाती है कि आप कम से कम अपने व्यक्तिगत नक्षत्र से जुड़ी धूप को प्रतिदिन जलाएं ताकि आपको उस नक्षत्र से जुड़ी सकारात्मक उर्जा प्राप्त होती रहे|

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