डॉ. पिल्लै के अनुसार- “ भगवान नटराज के लिए जलाभिषेक का समय वर्ष में केवल 6 बार आता है| योगी व सिद्धपुरुष इस समय के लिए तत्पर रहते हैं ताकि वे नटराज के साथ जुड़ने का लाभ उठा सकें। यह समय भगवान शिव की उर्जा का पृथ्वी पर आने हेतु एक पवित्र काल माना गया है|”
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चेतना के सुनहरे महाकक्ष में नटराज के दिव्य नृत्य को ‘आनंद तांडव’, अर्थात परमानंद से भरे ब्रह्मांडीय नृत्य के रूप में जाना जाता है। वर्ष में छह बार, नटराज की ऊर्जा पृथ्वी के धरातल पर सक्रिय हो जाती है। शरद ऋतु, वसंत ऋतु, ग्रीष्म ऋतु, हेमंत ऋतु, वर्षा ऋतु और शरद ऋतु आदि ये छह ऋतुएं हैं जो उषाकाल, प्रातः, मध्याह्न, अपराह्न, संध्या व रात्रि के साथ मेल खाती हैं।भगवान शिव की इस परिवर्तनकारी ऊर्जा का सम्मान करने व नटराज अभिषेक अनुष्ठान द्वारा इसे आमंत्रित करने के लिए यह दिवस शुभ व महत्वपूर्ण है|
नटराज की गतिशील ऊर्जा उन बुरे कर्मों के प्रभाव को दूर करती है जो हमारी क्षमता को सीमित करते हैं| यह उर्जा नकारात्मक कर्मों को समाप्त कर सकती है। भगवान शिव अपने ब्रह्मांडीय नृत्य के इशारे से निम्नलिखित पांच दैवीय गतिविधियों का प्रतिनिधित्व करते हैं:
1. 1. भगवान शिव अपने ऊपरी हाथों में निर्माण व विनाश के प्रतीक चिन्ह पकडे हुए हैं|
2. 2. ऊपरी दाहिने हाथ में छोटा डमरू ध्वनि के निर्माण या उत्पत्ति का प्रतीक है|
3. ऊपरी बाएं हाथ में अग्नि विनाश की प्रतीक है|
4. भगवान शिव की दूसरे दाहिने हाथ की अभय मुद्रा (आशीर्वाद चिह्न) अभय व सुरक्षा प्रदान करने की प्रतीक है| साथ ही यह बुराई और अज्ञान दोनों को समाप्त करके न्याय व नीतिपरायणता को दर्शाती है|
5. दूसरा बायाँ हाथ उनके ऊपर उठे हुए पैर की ओर संकेत करता है जोकि जीवन में उत्थान व मुक्ति को दर्शाता है|
6. नटराज को एक दैत्य के ऊपर नृत्य करता दिखाया गया है जो अज्ञानता पर भगवान शिव की विजय का प्रतीक है|
डॉ. पिल्लै कहते हैं कि जलाभिषेक अनुष्ठान के दौरान दूध, दही, घी, व संतरे का रस चढाने से भगवान शिव की प्रतिमा जाग्रत हो जाती है| उन्होंने यह भी कहा है कि इन पदार्थों को चढ़ाना कोई अंधविश्वास नहीं है, ये वो प्रक्रियाएं हैं जो किसी प्रतिमा को चेतन करती हैं तथा यह प्रतिमा बाद में आपकी प्रार्थनाओं के उत्तर देती है और आपको उच्च चेतना के साथ जोड़ने का कार्य करती है|
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वर्ष में केवल 6 बार भगवान नटराज की उर्जा पृथ्वी के धरातल पर सबसे अधिक सक्रिय होती है| डॉ. पिल्लै कहते हैं कि जलाभिषेक अनुष्ठान के दौरान दूध, दही, घी, व संतरे का रस चढाने से भगवान शिव की प्रतिमा जाग्रत हो जाती है| नटराज की गतिशील ऊर्जा उन बुरे कर्मों के प्रभाव को दूर करती है जो हमारी क्षमता को सीमित को सीमित करते हैं| यह उर्जा नकारात्मक कर्मों को समाप्त कर सकती है। इस अनुष्ठान में भाग लेकर अपनी निष्कपट प्रार्थना के द्वारा अपने बुरे कर्मों का नाश करके सकारात्मक उर्जाओं के माध्यम से आप अपने जीवन को सशक्त बना सकते हैं|
आप क्या प्राप्त करेंगे?
आपको पवित्र विभूति व लाल सिंदूर प्रदान किए जाएंगे। जो कि इस पवित्र अनुष्ठान द्वारा सिद्ध होंगे। इस पवित्र विभूति व सिंदूर को अपने मंदिर अथवा ध्यान कक्ष में रखें तथा अपनी दैनिक पूजा व ध्यान करने के समय इन्हें अपने मस्तक पर धारण करके दैवीय कृपा प्राप्त करें।
डॉ. पिल्लै के अनुसार:
“ यह अनुष्ठान हमारे विचारों का कार्बनीकरण कर देता है। कार्बन हमारी सूचनाओं से सम्बंधित सूक्ष्म अनु कण होते हैं। इस कार्बनीकरण प्रक्रिया से प्राप्त पवित्र राख को प्रसाद स्वरुप दिया जाता है। इस प्रसाद स्वरूप पवित्र राख को मस्तक पर धारण करने से आपको दैवीय कृपा प्राप्त होती है।”
कृपया ध्यान दें-: इस पूरी अनुष्ठान प्रक्रिया के उपरांत आपको दिया जाने वाला प्रसाद एक सप्ताह के बाद चेन्नई (तमिलनाडु) से भेज दिया जाएगा। विदेशों में पहुँचाने हेतु कृपया हमें दो से चार हफ़्तों का समय दें।